छत्तीसगढ़ के कई सुदूर इलाकों में पिछले कई दशकों से एक लकीर खिंच गई है. एक तरफ सरकार है, एक तरफ माओवादी. दोनों लोगों केअसल हिमायती होने का दावा करते हैं, दोनों तरफ बंदूक का ज़ोर है; लोगों को एक को चुनना है. इसने अदेखी लकीर ने अनगिनत ज़िंदगियां बांट दी हैं. ऐसा ही एक किस्सा मधकम भीमा का भी है. मधकम भीमा छत्तीगढ़ पुलिस में हैं. छत्तीसगढ़ पुलिस, वो फोर्स जिसका ‘दुश्मन नंबर वन’ एक करोड़ का ईनामी माओवादी मडवी हिडमा है.
मडवी हिडमा और मधकम भीमा में मामा-भांजे का रिश्ता है.
मामा मडवी हिडमा अपने भांजे मधकम भीमा से सिर्फ एक साल बड़ा है. दोनों साथ ही बड़े हुए हैं. बचपन में दोनों माओवादियों के संपर्क में आ गए थे. माओवादियों ने बाल संघम नाम से बच्चों की विंग बना रखी है. इसमें बहुत कम उम्र के बच्चों को हथियार थमा कर सरकार से लड़ने के लिए भेजा जाता है. हिडमा और भीमा की भी 12 साल की उम्र में ही गुरिल्ला ट्रेनिंग शरू हो गई थी. दो साल बाद यही दोनों संगम के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष बने. आगे चल कर भीमा भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवीदी) की गुरिल्ला पीपल्स कमिटी का सचिव बने . हिडमा ने भाकपा की मिलिटरी बटालियन को चुना. लेकिन इनका साथ नहीं छूटा. हमेशा गहरी दोस्ती रही.
भांजा
माओवादी आंदोलन खत्म न होने की सबसे बड़ी वजह ये है कि उसमें लगातार नए लड़ाके भर्ती होते रहते हैं. माओवादी प्रोपगंडा इसी तरह ज़िंदा रहता है. अपने इलाके में ये काम भीमा का था. और इसी काम के चलते भीमा और हिडमा के बीच दूरी पनपी. भीमा ने जिन लोगों को रिक्रूट किया, उन में से कई को पुलिस इंफॉर्मर बता कर मार डाला गया. इस सब ने मधकम पर गहरा असर डाला. आखिर में उन्होंने माओवादी आंदोलन छोड़ने का मन बना लिया. 2006 में सरेंडर कर दिया.
सरकार लगातार नक्सलियों से सरेंडर करने की अपील करती रहती है. सरेंडर करते हुए नक्सल कमांडर कुंदन पाहन
मामा
लेकिन हिडमा बना रहा. आज वो माओवादियों की दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी (डीकेएसजेडसी) का भी सदस्य है. पीपल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की बटालियन – 1 की तीनों यूनिट उसी को रिपोर्ट करती हैं. उसने सुरक्षा एजेंसियों पर एक के बाद एक घातक हमले किए हैं. 2010 का चिंतलनार (जिसमें सीआरपीएफ के 76 जवान मारे गए थे), 2013
का झीरम घाटी (छत्तीसगढ़ कांग्रेस के नेताओं पर हमला) और इस साल 24 अप्रैल को सुकमा (जिसमें सीआरपीएफ के 25 जवान मारे गए थे) हिडमा के कराए बड़े हमलों में शामिल हैं. पिछले दिनों सुकमा से कनाडा के एक सैलानी को अगवा करने का प्लान भी उसी ने बनाया था.
हिडमा एक बेहतरीन माओवादी लड़ाका और रणनीतिकार माना जाता है. इसीलिए ये मालूम होने के बावजूद कि वो बुर्कापाल और चिंतागुफा में कहीं रहता है, उसे पकड़ा नहीं जा सका है. हिंदुस्तान टाइम्स में छपी खबर के मुताबिक हिडमा के किए हमलों में अब तक 200 पुलिस वालों की जान जा चुकी है. सरकार ने उस पर इनाम बढ़ा कर एक करोड़ रुपए कर दिया है और वो न सिर्फ छत्तीसगढ़, बल्कि पूरे देश का मोस्ट वॉन्टेड माओवादी है.
भीमा ने 2011 में फिर बंदूक उठाई. इस बार पुलिस के लिए. अखबारों में इस तरह की खबरें यूं छपती हैं कि एक और ‘नक्सली’ मुख्यधारा में शामिल हुआ. लेकिन भीमा का का ‘सही रास्ते पर लौटना’ उन्हें बड़ा महंगा पड़ा. उनके भाई की हत्या हो गई. उनके परिवार को समाज से बाहर कर दिया गया. भीमा ज़्यादा कुछ नहीं कर सकते थे. उनका गांव पुरवती उस इलाके में पड़ता है जिन्हें माओवादी लिबरेटेड ज़ोन बुलाते हैं. इन इलाकों में सरकार का नामोनिशान नहीं है, माओवादियों का कानून चलता है. तो सरेंडर के बाद गांव-गांव भीमा के पुतले जले. हिडमा ने मीटिंग बुला कर भीमा को गद्दार घोषित कर दिया.
भीमा का माओवादियों के साथ का अनुभव पुलिस के बड़े काम का है. लेकिन फिलहाल भीमा एक मामले में सस्पेंड चल रहे हैं और उनके खिलाफ सीबीआई इंक्वायरी हो रही है. लेकिन भीमा का इरादा नहीं बदला है. बकौल हिंदुस्तान टाइम्स, भीमा कहते हैं,


